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Inspirational Story in Hindi with Moral | जानने और करने में अंतर | Motivational Blogs in Hindi

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एक समय की बात है जब लगभग अस्सी(८०) वर्ष की आयु के एक प्रसिद्ध विद्वान के बारे में यह कहा जाता था कि उनमें सीखने और समझने की कोई सीमा नहीं थी। तभी यह अफवाह फैल गई कि कोई नया उपदेशक दूर देश में घूम रहा है जिसके पास इस बूढ़े व्यक्ति से भी ज्यादा ज्ञान है।

यह बात उस बूढे पंडित तक पहुंची जिसे वह पचा नहीं पाए। "कुछ न कुछ करके उस उपदेशक को हराना होगा," उन्होंने खुद से कहा।


अपनी उन्नत उम्र के बावजूद, वह अकेले ही इस कठिन यात्रा के लिए निकल पड़े। महीनों सड़क पर रहने के बाद वह बूढ़े विद्वान उस उपदेशक के पास पहुंचे, अपना परिचय दिया और उसे अपनी यात्रा का उद्देश्य बताया।


उसके बाद उस बूढ़े विद्वान् ने पूछा की अपने उपदेश के बारे में बताओ तुम क्या जानते हो? उपदेशक ने जवाब में कहा, "बुराई करने से बचने के लिए और जितना संभव हो उतना अच्छा काम करना चाहिए। यही मेरा उपदेश है।"


यह सुनकर बूढ़े विद्वान् बोल पड़े। "क्या मैंने इस छोटी सी तुकबंदी को सुनने के लिए यहां आने की तकलीफ उठाई है जो हर उपदेशी के मुंह से निकलती है? क्या तुम मेरा मजाक बना रहे हो?"


उपदेशक ने बड़ी शांति से उत्तर दिया, "मैं आप के साथ बिल्कुल मजाक नहीं कर रहा हूं। आपकी बात सही है, हर उपदेशी के मुँह से यह एक बात होती ही है। लेकिन, एक सच्चाई यह भी है, कि यह बात सिर्फ बोलने की रह जाती है हर कोई इस पर खरा नहीं उतर सकता।"


अगर सिर्फ ज्ञान होना ही खुद उच्चतम मूल्य का होता, तो पृथ्वी पर सबसे बड़ा विद्वान एक अच्छी तरह से संगृहीत पुस्तकालय जैसा होता। एक प्रभावी, मूल्यवान और सफल जीवन के लिए व्यक्ति को अपने और दूसरों के भले के लिए इस ज्ञान पर कार्य करना चाहिए। तभी ज्ञान की और ज्ञानी की गरिमा बनी रहती है।


इस कहानी से कहने का मतलब यह है, कि ज्ञान किसी भी चीज का हो जिसे आजकल प्रमाणपत्र के गुण ज़रिये माना जाता है जिसमें कोई इंजीनियर हो, कोई डॉक्टर हो, कोई फिलोसोफर हो, कोई वकील हो, कोई अभिनेता हो, संगीतकार हो, कोई नृत्यकार हो या फिर कोई चित्रकार हो इन सब में सिर्फ जानकारी पाने से डिग्री हासिल कर लें और इस के संबंधित लोगों के हित में कोई काम न किया जाए तो यह सब प्रतिभा व्यर्थ साबित होती है।


हमारे पास जितनी भी डिग्रियां हो, हम अगर उसे अपने या दुसरो के काम आने के लिए उपयोग करेंगे तभी हम अपनी उस प्रतिभा के माध्यम से खुद अपनी पहचान दुनिया में प्रस्थापित कर पाएंगे। अगर काम नहीं करेंगे तो एक दिन ऐसा भी आ सकता है की हमें डिग्रियां होने के बावजूद भी कोई नहीं पहचानेगा और खुद की ज़िन्दगी भी अहेरे गहरे नापसंद कामों में भटक जाएगी।


"ज्ञान सिर्फ हासिल करना ही सीमित नहीं होता उन्हें लोकहित में भी लाना बेहद जरूरी होता है। तभी हम 'सच्चे विद्यमान' कहलाएंगे।"


"Knowledge is not only limited to acquisition, it is very important to bring them in the public interest too. Only then will we be called truly great people."


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