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How to Build Trust with someone | How to deal with Trust issues | किसी पर Trust क्यों नहीं होता?

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Trust, Trust माने विश्वास, भरोसा, यकीन जो भी हम कहना चाहें।

बचपन से लेके young age में आने के time में हमारा nature ऐसा होता हे की हम ज़्यादातर कोई भी इंसान पर जल्दी trust कर लेते हैं। लेकिन दिक्कत तब आती है जब हम किसी इंसान पर भरपूर trust करें और वह हमारा trust एक ही पल में तोड़ दें चखना-चूर कर दें! और यह ज़्यादातर मामलों में जब हम young age में हो तब बहुत देखने को मिलता हैं।


नतीजन होता यह है की एक बार trust तूट जाने के बाद हमारा mindset ऐसा हो जाता हैं की हम हर दूसरे या तीसरे इंसान के ऊपर पूरी तरह trust नहीं कर पाते, यहां तक तो ठीक है लेकिन सबसे ज़्यादा problems तब होती है जब हम हर किसी पर शक करने लगे किसीको सही से समझ न पाए। चाहे वह सच्चा हो या झूठा, हम हर किसीको गलत मानने लगते हैं। कभी कभी ऐसा भी होता हैं कि कोई वाकही हमारा भला चाहता हो या वाकही हमारी मदद के लिए आया हो फिर भी हम उन पर trust नहीं कर पाते उलटा हमारे दिमाग में शक ज़्यादा पैदा हो जाता हैं।


तो अब हमें ऐसे में क्या करना चाहिए? क्या सामने वाले पर फिर से पूरी तरह trust करना चाहिए जैसा हम पहले करते थे? या फिर ऐसे ही उन पर शक करते रहना चाहिए? लेकिन trust करने लगे और फिर से trust तोड़ दिया तो! या अगर शक करने लगें, लेकिन वो वाकही में हमारे trust के लायक हो तो! ऐसे confusions हमारे mind में बहोत बार होते रहते हैं।


ऐसी solution के लिए एक ही चीज़ आपको करनी चाहिए जो आपके लिए बेहद कारगर साबित होगी, जो है जितना हो सके उतना सामने वाले व्यक्ति के साथ communication करते रहना। सामने वाले के चहेरे के expression देखना की वह आपके साथ बात करते वक्त कितनी देर तक eye to eye contact बनता हैं या कितनी बार आपसे नज़रें हटाता रहता हैं और बात करते वक्त इधर उधर देखते रहता हैं। अगर वह ज़्यादा देर तक eye to eye contact से बात करें तो समझ जाना की वह व्यक्ति trust करने लायक हैं और अगर eye to eye contact करने के बजाय हंमेशा इधर उधर देख कर बातें करें तो समझना की यह व्यक्ति trust के लायक नहीं।


लेकिन कभी कभी यह trick भी इतनी असरदार साबित नहीं होती हैं। सामने वाला अगर tricky इंसान हो तो वह आपसे eye to eye contact करने के बावजूद भी झूठ बोल सकता हैं। इसलिए आपको एक ही रास्ता नहीं अपनाना चाहए। शरुआत में अपना trust आप बनाएं रखें लेकिन इतना गहरा मत बनाना की सामने वाला कुछ भी आपसे मांग सके। शरुआत में trust करें, लेकिन उनके साथ साथ लगातार communication बनाए रखने के साथ उन्हें observe भी करते रहें। जितना हो सके उतना आप उनकी help करने के बजाए उनसे help लेते रहें।


आपका communication जितना उनसे आगे बढ़ेगा उतना आप automatically उनसे यह realize करने लगेंगे की वह actual में किस तरह का व्यक्ति हैं। उनके nature से आप इतना वाकिफ हो जाओगे की वह आपसे जो भी कहेगा उनमे कितनी सच्चाई या कितना झूठ हैं वह time रहते आपको अपने आप पता चलता जाएगा।


Overall कहने का मतलब यह हैं की किसी भी व्यक्ति से मिल कर तुरंत ऐसा न समजलें की आपको उन पर trust नहीं करना चहिए और यह भी न समझे की आपको उन पर आंख बंध करके trust कर उनकी बातों में आ जाना चाहिए। कुछ भी judgement अपने दिमाग में लाए बिना उनसे सिर्फ जितना हो सके उतना लम्बा communication बनाए रखें। समय रहते सच आपके सामने खुद ब खुद आ जाएगा। यानि आपको अपने आप यह realize हो जाएगा की सामने वाला व्यक्ति trust करने लायक हैं या अपने से दूर करने लायक हैं।


“Stay committed to your decisions, but stay flexible in your trust approach.”


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